शुक्रवार, 15 अक्टूबर 2010

हुसैन भारत लौटना चाहते हैं

http://www.bbc.co.uk/hindi/multimedia/2010/10/101004_hussain_part1_rp.shtml
एमएफ़ हुसैन से बातचीत का पहला हिस्सा
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जाने माने पेंटर एमएफ़ हुसैन ने पिछले दिनों लंदन में अपना 95वां जन्मदिन मनाया.
इस वर्ष के शुरू में क़तर की नागिरकता लेने की वजह से सुर्ख़ियों में आए हुसैन ने बीबीसी से लंबी बातचीत की.
इस बातचीत के पहले हिस्से में उन्होंने अपने जीवन और अपनी जीवन शैली के बारे में बताया.
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लेबल:

( बीबीसी से साभार )
हुसैन भारत लौटना चाहते हैं
राजेश प्रियदर्शी
बीबीसी संवाददाता, लंदन
एमएफ़ हुसैन भारत लौटना चाहते हैं
मशहूर पेंटर मक़बूल फ़िदा हुसैन का कहना है कि वे 'निर्वासन में क़तई नहीं' हैं और भारत लौटेंगे.
शुक्रवार को लंदन में अपना 95वाँ जन्मदिन मना रहे हुसैन ने बीबीसी से विशेष बातचीत में कहा कि "मैं निर्वासन में नहीं हूँ, मैं अपने प्रोजेक्ट पूरे करने के लिए भारत से निकला हूँ क्योंकि मुझे लगा कि वे वहाँ पूरे नहीं हो सकते."
उन्होंने कहा, "देखिए, जब मैं भारत से निकला था 2005 में तब कोई समस्या नहीं थी. मुझे तीन बड़े प्रोजेक्ट करने थे जिसके लिए स्पॉन्सर चाहिए थे जो भारत में नहीं मिल सकते थे इसलिए मैं पहले दुबई और फिर क़तर गया."
लंदन के पॉश इलाक़े मेफ़ेयर के एक अपार्टमेंट में बड़े बड़े कैनवसों पर महाभारत सीरिज़ की विशाल पेंटिग्स बना रहे एमएफ़ हुसैन कहते हैं, "वैसे भी भारत में कोई कभी मेरा कोई स्टूडियो या एक ठिकाना नहीं रहा, मैं घूम घूम कर पेंटिंग्स करता रहा हूँ, अक्सर भारत से बाहर रहा हूँ."
भारत की संस्कृति और उसकी तमाम बातें मेरे भीतर पूरी तरह भरी हुई हैं, मैं 90 साल तक वहाँ रहा हूँ, अगर आप मुझे एक हज़ार साल तक किसी जंगल में भी छोड़ दें तो वो बातें मेरे भीतर से ख़त्म होने वाली नहीं हैं
हाथ में लाठी जितनी बड़ी कूची को हवा में लहराकर हुसैन कहते हैं, "जितना प्यार मुझे भारत में मिला, भारत का बच्चा-बच्चा मुझे जानता है, उतना प्यार मुझे दुनिया में किसी ने नहीं दिया, मैं शरीर से भारत से दूर हूँ लेकिन उससे क्या होता है, मेरा दिल-दिमाग़ सब भारत में है."
हिंदू देवियों के नग्न चित्र बनाने के मुद्दे पर शुरू हुए हंगामे के बाद एमएफ़ हुसैन ने इसी वर्ष फ़रवरी महीने में क़तर की नागरिकता ले ली जिसकी मीडिया में बहुत चर्चा हुई थी.
रंगों और ब्रशों से घिरे अपने मूढ़े पर बैठे हुसैन भावुक होकर कहते हैं, "भारत की संस्कृति और उसकी तमाम बातें मेरे भीतर पूरी तरह भरी हुई हैं, मैं 90 साल तक वहाँ रहा हूँ, अगर आप मुझे एक हज़ार साल तक किसी जंगल में भी छोड़ दें तो वो बातें मेरे भीतर से ख़त्म होने वाली नहीं हैं."
ये पूछे जाने पर क्या उनका भारत जाने का इरादा है तो उन्होंने कहा, "ये तो पोलिटिकल झमेला है, आज नहीं तो कल ख़त्म हो जाएगा. फ़िलहाल तो मुझे इंडियन सिविलाइज़ेशन और अरब सिविलाइज़ेशन के दो बड़े पेंटिंग प्रोजेक्ट करने हैं उसमें दो साल लगेंगे. मैंने सोचा कि ये प्रोजेक्ट किसी अरब देश में रहकर पूरा किया जाए. उसके बाद ज़रूर जाऊँगा."
'मैं भागा नहीं हूँ'
हुसैन ने बताया कि उन्होंने विदेश में बसे भारतीय मूल के लोगों के लिए दी जाने वाली 'नागरिकता' ले ली है. उन्होंने कहा, "मैं जब चाहे भारत जा सकता हूँ, मुझे वीज़ा या पासपोर्ट की ज़रूरत नहीं है, मैं ओवरसीज़ सिटिज़न ऑफ़ इंडिया हूँ."
मैं क़ानून से भागा नहीं हूँ, वह प्रक्रिया चल रही है, कोर्ट के सम्मन आते हैं मेरे वकील जवाब देते हैं
उन्होंने भारत की नागरिकता छोड़कर क़तर की नागरिकता लेने का फ़ैसला क्यों किया, इसका जवाब देने के बदले एमएफ़ हुसैन कहते हैं, "जिसे जो कहना है, कहता रहे, मेरे ऊपर कोई प्रतिबंध तो है नहीं, जब मेरा जी करेगा भारत जाऊँगा."
मीडिया के रवैए की शिकायत करते हुए वे कहते हैं, "मीडिया कभी ये नहीं लिखता कि मेरे ऊपर 900 से ज़्यादा मुक़दमे लाद रखे हैं, पिछले 12 साल से मैं अपने वकीलों को 60-70 हज़ार रुपए हर महीने देता हूँ."
वे कहते हैं, "मैं क़ानून से भागा नहीं हूँ, वह प्रक्रिया चल रही है, कोर्ट के सम्मन आते हैं मेरे वकील जवाब देते हैं. होम मिनिस्ट्री की एक इनक्वायरी अब भी चल रही है, मुझे समझ में नहीं आता कि ये क्या हिमाक़त है."
इसका मतलब निकाला जा सकता है कि भारत के सेक्युलर डेमोक्रेटिक न्याय व्यवस्था में उनका यक़ीन नहीं है, इस पर हुसैन ने कहा, "ऐसा बिल्कुल नहीं है, अगर ऐसा होता तो मैं ओवरसीज़ इंडियन सिटिज़नशिप क्यों लेता?"
एमएफ़ हुसैन ने बताया कि वे जल्दी ही एक फ़िल्म भी बनाने वाले हैं जिसमें विद्या बालन होरीइन होंगी.
उन्होंने बताया, "अगले साल फ़रवरी-मार्च से इस फ़िल्म की शूटिंग शुरू हो जाएगी, अभी मैं स्क्रिप्ट लिख रहा हूँ."
अगर एमएफ़ हुसैन अपनी अगली फ़िल्म बनाते हैं तो वे संभवतः सिनेमा के इतिहास में सबसे उम्रदराज़ निर्माता-निर्देशक होंगे.
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मंगलवार, 3 अगस्त 2010

रजा की वापसी- बी.बी.सी. से साभार-

(हुसेन के जाने के बाद एइसा लगने लगा था जैसे यह देश कलाकारों के लिए औचित्य पूर्ण नहीं है पर रजा की वापसी से यह बात बदलेगी)-रत्नाकर

'भारत की मिट्टी को चूमना चाहता हूँ'

सबसे मशहूर भारतीय पेंटर का नाम पूछा जाए तो ज़्यादातर लोगों के दिमाग़ में एमएफ़ हुसैन का नाम आएगा लेकिन भारत के सबसे महँगे पेंटर को लोग कम ही जानते हैं.

एमएफ़ हुसैन के ठीक विपरीत, सैयद हैदर रज़ा विवाद तो क्या, पत्रकारों से भी कोसों दूर रहते हैं, पुराने पेरिस के एक गुमनाम से अपार्टमेंट में, बिल्कुल एकांत में अपने रंगों के साथ.

हुसैन जहाँ भारत को छोड़कर क़तर की नागरिकता ले चुके हैं, वहीं रज़ा 88 साल की उम्र में बाक़ी जीवन गुज़ारने के लिए भारत लौटना चाहते हैं, छह दशक तक पेरिस में रहने के बाद.

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कुछ समय पहले जब लंदन के नीलामीघर क्रिस्टीज़ ने रज़ा की पेंटिंग 'सौराष्ट्र' की नीलामी 16 करोड़ रुपए में की तो वे भारत के सबसे महँगे कलाकार के रूप में चर्चा में आए.

1922 में मध्य प्रदेश में दमोह ज़िले में बावरिया गाँव में जन्मे रज़ा को इंटरव्यू के लिए राज़ी करना कठिन काम था क्योंकि वे इसे 'समय की बर्बादी और डिस्ट्रैक्शन' मानते हैं.

पेरिस के उनके घर पर बीबीसी हिंदी के राजेश प्रियदर्शी ने उनसे लंबी बातचीत की, बिना अँगरेज़ी की मिलावट किए रज़ा ने शुद्ध हिंदी में अपनी कला यात्रा पर बात की.

आपने इस वर्ष के अंत में सब कुछ समेटकर हमेशा के लिए भारत जाने की घोषणा करके सबको चौंका दिया है, क्या वजह है इस निर्णय की-

भारत जाने से ही बहुत आनंद मुझे मिलेगा. इस सुख का मैं वर्णन भी नहीं कर सकता. यह वही भारतीय जान सकता है जिसे अपने देश से प्रेम हो. मेरी पत्नी जेनिन मोनज़िला का देहांत हो चुका है 2002 में, मैं अकेला हूँ, मेरी कोई संतान नहीं है. मैं अब चाहता हूँ कि अपने देश आ सकूँ, जो समय मेरे पास बचा है वो अपने देश में बिता सकूँ, मंदिरों में जा सकूँ, मस्जिदों में जा सकूँ, गिरिजाघर में जा सकूँ, मित्रों से मिलकर हिंदी में बात हो सके, संस्कृत के श्लोक सुन सकूँ.

इस निर्णय तक पहुँचने में आपको इतना समय क्यों लगा, पहले क्यों नहीं जा सके भारत?

मेरी पत्नी जेनिन अपने परिवार में इकलौती बेटी थीं और उनके माता पिता ने मुझसे अनुरोध किया कि अगर मैं पेरिस में रह सकूँ तो अच्छा होगा. मुझे फ्रांस शुरू से बहुत पसंद है, यहाँ काम करने की बहुत सुविधा थी इसलिए यहाँ रह गया क्योंकि मेरे लिए चित्र बनाना सबसे बड़ी बात थी. मैं यहाँ रहा मगर देश से संबंध हमेशा बना रहा, हिंदी बोलता रहा, हिंदी पुस्तकें पढ़ता रहा, देश के मित्र आते रहे, मैं भारत जाता रहा, देश को कभी भूला नहीं, हाँ दूर ज़रूर था लेकिन मेरा विश्वास है कि मैंने देश को कभी छोड़ा ही नहीं, जैसे मैं हमेशा वहीं रहा हूँ, इसीलिए मैंने अपना भारतीय पासपोर्ट साठ साल बाद भी बनाए रखा है. अब फ्रांस को धन्यवाद कहते हुए वापस लौट जाना चाहता हूँ ताकि उसी धरती को चूम सकूँ जहाँ मैं पैदा हुआ हूँ.

भारत की वो कौन-सी यादें हैं जिन्हें साठ साल तक पेरिस में रहने के बाद भी आप नहीं भूल पाए हैं?

मंडला में हम रहते थे, बहुत सुंदर जगह थी. जानवर, पंछी, मंदिर, नदियाँ, पहाड़, जंगल सब कुछ बहुत सुंदर था. मैं बहुत ही मामूली विद्यार्थी था, पढ़ाई में दिल नहीं लगता था, ईश्वर की कृपा से मुझे बहुत अच्छे शिक्षक मिल गए जिन्होंने पहचाना कि मैं चित्रकला में कुछ कर सकूँगा तो उन्होंने कहा कि मुझे आर्ट की शिक्षा दिलानी चाहिए. मैं मंडला वापस जाना चाहता हूँ क्योंकि वहाँ बहुत सुंदर यादें हैं जिन्हें मैं वापस जगाना चाहता हूँ.

आप इतने समय तक पेरिस में रहने के बाद एक अलग तरह के जीवन के आदी हो गए हैं, क्या अब आप भारत में रह पाएँगे?

यहाँ की जो आदतें हैं उनकी बात दूसरी है लेकिन मैं वहाँ की आदतों को अपना लूँगा, वहाँ जिस तरह रहना चाहिए उसी तरह रहूँगा. मैं हिंदी भाषा अच्छी तरह बोल सकता हूँ, अपने गाँव के लोगों से भी उनकी बोली में बात कर सकता हूँ, उनसे कह सकता हूँ--'काए भइया कहाँ जात हौ'.. मज़ा आ जाएगा.

क्या भारत जाने पर आपको फ्रांस याद नहीं आएगा जहाँ आपके जीवन का सबसे बड़ा हिस्सा गुज़रा है?

फ्रांस ज़रूर याद आएगा लेकिन अपना देश तो अपना देश है, उससे हमारा आत्मा और शरीर का जो संबंध है वो दूसरा होता है. फ्रांस को कभी नहीं भूल सकता, चित्रकला में पहचान तो फ्रांस ने ही दी.

आपने 1950 के दशक में फ्रांस आने का फ़ैसला कैसे किया?

फ्रांसीसी चित्रकला मुझे हमेशा से बहुत अच्छी लगती रही है. मैंने फ्रांसीसी चित्र किताबों में, रिप्रॉडक्शन में देखे. मैंने तय कर लिया कि अगर मैं कभी विदेश गया तो फ्रांस ही जाऊँगा. मुंबई में फ्रेंच कान्सुलेट में मेरे दोस्त थे जो मेरे चित्र पसंद करते थे उन्होंने कहा कि अगर मैं फ्रेंच सीख लूँ तो मुझे वहाँ स्कॉलरशिप मिल सकती है, मैंने दो साल तक फ्रेंच सीखी और पेरिस आ गया. मुझे यहाँ आते ही फ्रांस से लगाव हो गया, मैंने यहाँ बीस-तीस साल तक बहुत ख़ामोशी से, एकांत में, धैर्य से काम किया.

आपकी शुरूआत की पेंटिंगों में पेरिस का जीवन दिखाई देता है लेकिन उसके बाद अचानक आपकी चित्रकला में सारे प्रतीक, सारे चिन्ह, सारे मुहावरे भारतीय हो जाते हैं, ऐसा कब हुआ और कैसे हुआ?

ये 1978 की बात है, मैंने अपने आपसे कहा कि ऐसे नहीं चलेगा. मैंने ख़ुद से पूछा, रज़ा, तुम्हारी चित्रकला में तुम्हारा देश कहाँ है? देश के विचार कहाँ हैं? मैंने तभी से देश के विचार ढूँढना शुरू किए, यंत्रा, मंत्रा, बिंदु, कुंडलिनी वग़ैरह उसी के बाद मेरे चित्रों में आए, ईश्वर की कृपा से ऐसा हो सके, और देखिए कि यह फ्रांस में हुआ.

इस समय आप भारत के क्लिक करेंसबसे महँगे पेंटर हैं, आपकी पेंटिंग सौराष्ट्र सोलह करोड़ रुपए में बिकी है, आपको कैसा लगता है?

देखिए जब मुझे समाचार मिला तो मुझे खुशी हुई, मुझे अच्छा लगता है कि मेरे चित्रों को इतना मान दिया जा रहा है. मैं तो एक ग़रीब चित्रकार की तरह काम करता रहा हूँ और करता ही रहूँगा. पैसे की मुझे कभी कोई चिंता नहीं रही है.

आपको पहचान मिलने में काफ़ी समय लगा, क्या इसकी वजह ये तो नहीं रही कि आप विवादों से हमेशा दूर रहे?

हाँ, समय तो बहुत लगा, मेरा जीवन काफ़ी कठोर रहा है, पैसे की काफ़ी तकलीफ़ रही है, लेकिन मैं तो इसके बारे में सोचता भी नहीं, मेरा अपना स्वभाव है और मैं अपने स्वभाव के हिसाब से काम करता हूँ. क्या मिला, क्या नहीं, देर से मिला या समय पर मिल गया, इन सबके बदले मैं यही सोचता हूँ कि मैं कुछ काम कर पाया हूँ जो लोगों को पसंद आ रहा है, यही बहुत है.

एक पेंटर के रूप में आपका दिन किस तरह गुज़रता है?

मैं कभी-कभी रात भर नहीं सोता, कभी-कभी दिन भर सोता रहता हूँ, कभी ग्यारह-बारह बजे तक नींद आ जाती है, पिछले दिनों काफ़ी देर देर तक नींद नहीं आती थी, पेंटिंग बनाता रहता हूँ, कोई ख़ास समय नहीं है पेंटिंग बनाने का. पिछले एक महीने से काफ़ी थकान थी, क्या किया जाए, 88 साल की उम्र में शरीर की तकलीफ़ें तो होती ही हैं. ईश्वर की कृपा है कि इतनी उम्र मिली, इच्छा यही है कि आगे भी काम कर सकूँ.

इस समय चर्चा ये हो रही है कि आप भारत के सबसे महँगे पेंटर हैं लेकिन आप क्या चाहते हैं कि लोग आपको किस तरह याद रखें?

पैसे के बारे में बात करना मुझे बहुत बेकार लगता है. अगर पैसे की वजह से लोग समझें कि मैं चित्रकार हूँ तो यह बेकार बात है. मैं मानता हूँ कि चित्रों का अपना एक अर्थ होता है उसको समझना चाहिए और उसे ही देखना चाहिए. जिस तरह एक सुंदर स्त्री एक पुरुष के पीछे नहीं भागती बल्कि उसका प्रेमी ही उसके पास आता है, इसी तरह कलाकार को यह नहीं देखना चाहिए कि मेरी पेंटिंग कौन ख़रीदेगा, कितने पैसे मिलेंगे, बल्कि अपना सारा ध्यान अपनी कला पर केंद्रित करना चाहिए, कला प्रेमी ख़ुद-ब-ख़ुद आ जाते हैं.

बुधवार, 21 अप्रैल 2010

कलुषित मानसिकता और कला संरचना का भ्रष्टाचार

आधुनिक कला प्रवृति और कंप्यूटर की रचना धर्मिता 

रत्नाकर 
कला जगत आजकल कुछ असामान्य हो रहा है एसा नहीं लगता पर आज़ादी के दिनों के बाद भी यही हाल रहा है, पर कला और कलात्मकता से विरत भी बहुत सारी अवधारणायें कला जगत में लेकर कुछ  लोग आ गए है, एसे में क्या हो रहा है इसकी विज्ञता से कोसो दूर हुसेन को देवी देवताओं के नंगे चित्रकार के रूप में  स्थापित कर भ्रामक रूप में इसकी जानकारी लोगों को दी गयी और उन्हें देश  से निर्वासन जैसा झेलना पड़ा है, अमूमन  हर रचनाकार के साथ यही हो रहा है, क्योंकि देश की ताकत आज जिस ज्ञान को समर्पित है वह 'भ्रष्टाचार' की बड़ी तकनीक है. इसकी सजा तब मिलती है जब सब कुछ समाप्त होने की ओर होता है. यही कारण है की हुसैन के साथ भी यही हुआ हुसैन की रेखाओं में भारतीय संस्कृति, धर्म ,समाज की जटिलता के प्रति आक्रोश नज़र नहीं आया किसी को, क्योंकि वह हिन्दू नहीं थे, हिन्दू सदियों से कमजोर भी इसीलिए है की उसमे अपने आततायियों के प्रति लड़ने की ताकत शायद कमजोर पड़ गयी होगी पर हुसैन जैसा ही था जो इस मुल्क के सदियों के दलित और उनकी मानसिकता का सजीव चित्रण किया, जिस अहंकार के कारण - सुदामा - चाणक्य - परशुराम के रूप में एक ही व्यक्ति को पहचाना जा सकता है, वह कोई और नहीं 'तोगड़िया' ही हो सकते है.
सदियों की कलुषित मानसिकता जिस देश को खोखला कर दी हो सामंती और दुराग्रही बना दी हो वहां विकास के नाम पर केवल और केवल लूट मची हो न कानून हो और न ही मानवता. जहाँ एक तरफ एक एसी आवादी रहती है जिसका जीना दूभर हो और दूसरी ओर भ्रष्ट और जातीय अहंकार चालाकी और बेईमानी का सामराज्य हो, वहां जो अपने हक़ की लड़ाई में भी तिरस्कृत किया जाता हो पर दूसरी ओर भ्रष्ट समुदाय मगन रहता हो और दुसरे उसके कुकर्मों से सदियों से जूझ रहे हों.
इसी सड़ी गली व्यवस्था का हिस्सा है या होकर रह गयी है कला शिक्षा तमाम जगहों पर कला शिक्षक बिना साधना के कला शिक्षार्थियों को गुमराह कर रहे हैं या उन्हें पंगु बनाकर रख दे रहे हैं .


मंगलवार, 9 मार्च 2010

हुसैन के बाद


















































'हुसैन के बा' नाम से इस ब्लॉग की शुरआत की जा रही है -
क्योंकि हुसेन जिन कारणों से देश का प्रतिनिधित्व कर रहे थे उनके बदले उन्हें 'देवी देवताओं' की नग्न आकृतियों की वजह से उनके खिलाफ भारतीय मानस बेचैनी महसूश किया और भले ही जिन्होनें उनके खिलाफ फतवा जारी किया, वह धीरे धीरे पुरे जनमानस को झकझोर दिया है, और आज उन्हें इन्ही कारणों से देश छोड़ना पड़ा, देश तो कईयों ने छोड़े है पर उन्हें अपने धर्मों में बुराइयाँ दिखी थी, पर हुसेन को यही बुराइयाँ अपने धर्म में न दिखायी देकर हिंदुयों के देवी देवताओं में दिखीं .
कारण हिन्दू देवी देवताओं के इस तरह के चित्रों में उन्हें रचना की जो खूबियाँ दिख रही थी वह किसी 'बुर्के' के भीतर नज़र न आना आँखों पर पट्टी बांधना नही तो क्या है ?
हुसैन की खूबियाँ -
जिस सामान्य से साईन बोर्ड पेंटर ने यह मुकाम हासिल क्या वह उसकी लगन और मेहनत ही है .
जिस भारतीय कला तत्वों को मकबूल फ़िदा हुसेन की कला ने स्वीकार और संवरण किया वही तत्त्व इन्हें स्मरणीय बनाते है.
पर स्मरण रहे हुसेन के जाने के बाद वह कला देश इनकी कला को क्या करेगा फेंक तो देगा नहीं, स्वाभाविक है हिंदुस्तान की कला इतिहास में यह पहले आदमी होंगे जिन्हें कला के नाम पर देश निकाला मिला है या भय से यह देश छोड़ कर चले गए है, जो भी है रचनाकार के कौशल के कारण हाथ कटवा लेने की परंपरा पुराणी रही है , मध्यकाल की कहानी रोज़ दुहराई जाये यह भारत जैसे धर्मनिरपेक्ष देश में ही हो सकता है.बौद्धिकता की बरगलस बस यहीं संभव है, सदविचार तो मात्र बहाना भर है |

हुसैन के बाप -






हुसैन के बाद  -
हुसैन के बाद  नाम से इस ब्लॉग की शुरआत की जा रही है