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| आधुनिक कला प्रवृति और कंप्यूटर की रचना धर्मिता |
रत्नाकर
कला जगत आजकल कुछ असामान्य हो रहा है एसा नहीं लगता पर आज़ादी के दिनों के बाद भी यही हाल रहा है, पर कला और कलात्मकता से विरत भी बहुत सारी अवधारणायें कला जगत में लेकर कुछ लोग आ गए है, एसे में क्या हो रहा है इसकी विज्ञता से कोसो दूर हुसेन को देवी देवताओं के नंगे चित्रकार के रूप में स्थापित कर भ्रामक रूप में इसकी जानकारी लोगों को दी गयी और उन्हें देश से निर्वासन जैसा झेलना पड़ा है, अमूमन हर रचनाकार के साथ यही हो रहा है, क्योंकि देश की ताकत आज जिस ज्ञान को समर्पित है वह 'भ्रष्टाचार' की बड़ी तकनीक है. इसकी सजा तब मिलती है जब सब कुछ समाप्त होने की ओर होता है. यही कारण है की हुसैन के साथ भी यही हुआ हुसैन की रेखाओं में भारतीय संस्कृति, धर्म ,समाज की जटिलता के प्रति आक्रोश नज़र नहीं आया किसी को, क्योंकि वह हिन्दू नहीं थे, हिन्दू सदियों से कमजोर भी इसीलिए है की उसमे अपने आततायियों के प्रति लड़ने की ताकत शायद कमजोर पड़ गयी होगी पर हुसैन जैसा ही था जो इस मुल्क के सदियों के दलित और उनकी मानसिकता का सजीव चित्रण किया, जिस अहंकार के कारण - सुदामा - चाणक्य - परशुराम के रूप में एक ही व्यक्ति को पहचाना जा सकता है, वह कोई और नहीं 'तोगड़िया' ही हो सकते है.
सदियों की कलुषित मानसिकता जिस देश को खोखला कर दी हो सामंती और दुराग्रही बना दी हो वहां विकास के नाम पर केवल और केवल लूट मची हो न कानून हो और न ही मानवता. जहाँ एक तरफ एक एसी आवादी रहती है जिसका जीना दूभर हो और दूसरी ओर भ्रष्ट और जातीय अहंकार चालाकी और बेईमानी का सामराज्य हो, वहां जो अपने हक़ की लड़ाई में भी तिरस्कृत किया जाता हो पर दूसरी ओर भ्रष्ट समुदाय मगन रहता हो और दुसरे उसके कुकर्मों से सदियों से जूझ रहे हों.
इसी सड़ी गली व्यवस्था का हिस्सा है या होकर रह गयी है कला शिक्षा तमाम जगहों पर कला शिक्षक बिना साधना के कला शिक्षार्थियों को गुमराह कर रहे हैं या उन्हें पंगु बनाकर रख दे रहे हैं .
इसी सड़ी गली व्यवस्था का हिस्सा है या होकर रह गयी है कला शिक्षा तमाम जगहों पर कला शिक्षक बिना साधना के कला शिक्षार्थियों को गुमराह कर रहे हैं या उन्हें पंगु बनाकर रख दे रहे हैं .
